मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 2 September 2017

डेरों, प्रचारकों की दुर्गति के कारण

                                                    आज के भौतिक युग में जिस तरह से हर व्यक्ति अपने ही कामों में व्यस्त रहने के लिए अभ्यस्त हो चुका है तो उसके लिये शारीरिक और मानसिक तनाव पैदा करने वाले कारकों में लगातार वृद्धि होती जा रही है जिससे अपने को बचाने का उसे कोई सुरक्षित मार्ग संसार में दिखाई नहीं देता है. यह एक ऐसी परिस्थिति होती है जब व्यक्ति के पास सांसारिक रूप से बहुत कुछ तो होता है पर उसके पास मन की शांति नहीं होती है जिसे खोजने के लिए वह अपनी निष्ठा और धर्म के अनुरूप प्रयास शुरू करता है जिसमें कई बार वह केवल अपने धर्म के बताये मार्ग पर चलकर ही आगे बढ़ने और शांति पाने का मार्ग खोज लेता है और कई बार जब उसकी मानसिक स्थिति उसे उस स्तर तक पहुँचने नहीं देती तो वह आज के सांसारिक गुरुओं की शरण में जाने के विकल्प के बारे में सोचना शुरू कर देता है जिससे उसका किसी डेरे या आश्रम के अनुयायी से संपर्क होता है और वह उस गुरु या आश्रम के साथ जुड़कर अपने को कुछ सहज बनाने के उपाय खोजने लगता है. यह ऐसी अवस्था होती है जिसमें वह व्यक्ति अपनी परेशानियों और उलझाव के चलते किसी भी तरह से सही गलत सोचने की स्थिति से आगे नहीं बढ़ पाता है और उसको डेरे या आश्रम तक ले जाने वाले व्यक्ति के प्रभाव के चलते वह वहां के पीठाधीश को अपने हर कष्ट का समाधान मानकर उनका अनुयायी बन जाता है. यहाँ पर यह विचार करने लायक है कि जो खुद अपनी परिस्थितियों से ऊबा और परेशान है वह किस तरह से अपने लिए सही गलत का चुनाव कर पाने में सफल हो सकता है ? ऐसी परिस्थिति ही उसे इस तरह से डेरों और आश्रमों तक ले जाने का काम बहुत आसानी से करती है जिसके बारे में उसे केवल अच्छी बातें ही बताई जाती हैं.
                              भारत प्राचीन समय से ही धर्म प्रधान कम धर्म भीरु अधिक रहा है और यह स्थिति कामबेश पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की कही जा सकती है तो ऐसी परिस्थिति में हमारे यहाँ जिस तरह से आश्रमों और अखाड़ों के साथ डेरों में ऊंचे स्तर की राजनीति चलती रहती है उसका दुष्प्रभाव भी इन सगठनों पर पड़ता ही रहता है जिससे निपटने के लिए इनके समाज या सरकार के पास कोई कारगर रास्ता नहीं होता है. बहुत बार योग्य उत्तराधिकारी के होने के बाद भी किसी ऐसे को पीठ पर बैठा दिया जाता है जो स्वभाव से शातिर और दूसरों पर नियंत्रण रखने की महत्वाकांक्षा को रखता है और यहीं से उस स्थान के उद्देश्यों में भटकाव शुरू हो जाता है. क्यों नहीं इन धार्मिक आश्रमों, अखाड़ों और डेरों के लिए भी एक धार्मिक प्रक्रिया का अनुपालन किया जाना आवश्यक होना चाहिए और उन पर सदैव ही सरकार और प्रशासन की नज़र भी होनी चाहिए ? जिस तरह से ये डेरे और अखाड़े विभिन्न समयों पर सरकारों के लिए बड़ी समस्या बनते रहे हैं तो उससे निपटने के लिए अब स्पष्ट रूप से कानून भी बनाया जाना चाहिए और स्थानीय एसडीएम / डीएम स्तर के अधिकारी को डेरे के आकार के अनुरूप इसका पदेन सदस्य बनाया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए जिससे इन स्थानों की गतिविधियों के बारे में सरकार के पास एक समग्र जानकारी सदैव उपलब्ध रहे और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग भी किया जा सके.
                             लम्बे समय से लाखों अनुयायियों वाले किसी डेरे, आश्रम या अखाड़े में प्रमुख के बदलने के साथ वहां काम करने वालों की निष्ठाएं बदलती रहती हैं और पहले महत्वपूर्ण काम सँभाल रहे लोगों को महत्वहीन कर दिया जाता है जिससे भी संकट बढ़ता है और अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए विरोधियों की हत्याएं तक की जाती हैं जिनका धर्म से कोई वास्ता नहीं होता है पर यह सब अनुयायियों की नज़रों से बहुत दूर होता है इसलिए उनकी श्रद्धा में कोई कमी दिखाई नहीं देती है और वे अपने गुरु के लिए कुछ भी करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं. इन डेरों को मानने वालों को केवल अपनी श्रद्धा से ही मतलब होता है और वे हर परिस्थिति में अपने गुरु को सही और सच्चा मानते रहते हैं जिसका उनको बहुत नुकसान भी होता है. वर्तमान में डेरा सच्चा सौदा के साथ उसके वर्तमान प्रमुख गुरमीत राम रहीम की हरकतों के चलते जो कुछ भी हुआ उसके लिए डेरे के अनुयायियों को गलत नहीं कहा जा सकता है क्योंकि वे केवल श्रद्धा भाव से ही यहाँ आकर या अपने शहरों में डेरे का प्रचार प्रसार करते रहते थे. गुरु पद पर बैठे हुए इस तरह के किसी व्यक्ति का भंडा फोड़ होने की दशा में डेरे के द्वारा चलाये जा रहे अच्छे कार्यों पर कोई दुष्प्रभाव न पडे इसके लिए हरियाणा सरकार को अविलम्ब एक व्यवस्था बनानी होगी जिससे गुरमीत राम रहीम के डेरा सँभालने से पहले जुडी हुई डेरे के साख के कारण जुड़े हुए परिवारों को कोई समस्या न हो जो सेवा भाव से डेरे का काम किया करते थे. जिस तरह से यह भी सामने आ रहा है कि डेरे के ५०० करोड़ रुपयों के उत्पाद भी बनाये जाते थे तो उससे जुड़े लोगों को रोज़गार देने या उसे बचाये रखने के लिए अविलम्ब कार्यवाही करने की आवश्यकता है साथ ही डेरे से जुडी शिक्षण संस्थाओं, औषधि केंद्रों के नियमित सञ्चालन हेतु आवश्यक धनराशि का आवंटन भी प्रति माह सुचारु रूप से हो सके इस बात पर उचित ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है. डेरे के विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों और पढ़ाने वाले लोगों के सामने किसी तरह का आर्थिक संकट भी न उत्पन्न हो इस पर भी विचार किया जाना चाहिए. हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार डेरे के खातों के संचालन पर रोक और संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए स्पष्ट नीति बनाई जानी चाहिए साथ ही डेरे के माध्यम से चल रहे सामाजिक कार्यों को लगातार जारी रखने हेतु एक उचित निर्देश भी हाई कोर्ट से प्राप्त किया जाना चाहिए जिससे एक व्यक्ति की गलतियों की सजा उन लोगों को न मिले जिसमें वे शामिल भी नहीं थे. साथ ही डेरे की संचालन समिति को भी परिवारवाद को बढ़ाने के स्थान पर डेरे के किसी और स्वीकार्य संत को आध्यात्मिक प्रमुख बना कर डेरे का काम शुरू करने का विकल्प भी खोलने के लिए हाई कोर्ट से उचित आदेश प्राप्त करने चाहिए.      
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Saturday, 12 August 2017

गोरखपुर-लापरवाही से मौतें

                                            अगस्त का महीना बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के गंभीर मरीज़ों पर कितना भारी पड़ा यह ऑक्सीजन की कमी के चलते होने वाली मौतों को देखकर समझा जा सकता है क्योंकि गोरखपुर के ही योगी आदित्यनाथ के यूपी के सीएम बनने के बाद जिस तरह से पूर्वांचल की किस्मत संवरने की बातें की जा रही थीं यह लापरवाही उस पूरी व्यवस्था और संकल्प का पोल खोलने के लिए काफी है. इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक बात यह भी है कि खुद सीएम आदित्यनाथ ने कुछ दिन पहले ही मेडिकल कॉलेज का दौरा किया था जिसमें सब कुछ सही होने का दावा किया गयाथा पर उसके तुरंत बाद ही इस तरह की अव्यवस्था सामने आयी है ? पूरे मामले में एक बात सामने आ रही है कि कॉलेज को ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली निजी फर्म की तरफ से १ अगस्त को ही कॉलेज प्रशासन को सूचित कर दिया गया था कि लगभग ६५ लाख के बकाये का भुगतान न होने की दशा में उसके लिए निर्बाध ऑक्सीजन सप्लाई कर पाना संभव नहीं होगा इसके बाद भी कॉलेज प्रशासन, जिला प्रशासन या राज्य शासन की तरफ से इस मामले में कोई सार्थक पहल नहीं की गयी जो कि अपने आप में बहुत ही चिंताजनक है. मानसून का यह महीना वैसे भी पूर्वांचल के लोगों पर जापानी बुखार के चलते कई दशकों से अभिशाप ही बना हुआ है पर इस बार मानवीय लापरवाहियों के चलते इस तरह की मौतें होने की घटना पहली बार सामने आयी है.
                            निश्चित तौर पर यह खुद सीएम आदित्यनाथ और भाजपा के लिए बहुत शर्मिंदगी की बात है क्योंकि उनकी तरफ से पूरी व्यवस्था को सुधारने की बात कही जा रही है पर साथ ही इस तरह की घटनाओं से यह भी दिखाई देने लगता है कि सरकार मूलभूत बिंदुओं को नज़रअंदाज़ करते हुए अपने अनुसार ही सब कुछ चलाना चाहती है जबकि बहुत सारी व्यवस्थाएं अपने आप में पूर्ण रूप से पहले से ही निरापद हैं बस उनके सञ्चालन में लगे हुए लोगों को सही दिशा में निर्णय लेने की आवश्यकता है. इस तरह की लापरवाही में निश्चित तौर पर सीधे तौर पर सरकार का कोई हाथ नहीं होता है पर विपक्षी दल सदैव ही इस तरह के मामलों में अपनी राजनीति को आगे करने की कोशिशें करते रहते हैं तो इस बार भी यूपी और केंद्र में विपक्षी दलों को इस मामले को हवा देने का काम ही करना है. सरकार की तरफ से कुछ समितियां बनाकर लोगों को निलंबित करने का काम ही किया जाना है क्योंकि उसे अपने ऊपर आने वाले दबाव को पूरी तरह से हटाना भी है तथा यह भी सन्देश देना है कि उनकी प्राथमिकता में सब कुछ सुधारना भी है और दोषियों को किसी भी स्तर पर छोड़ा भी नहीं जायेगा भले ही वह कितने ऊंचे पद पर ही क्यों न हो. पर इस तरह की सजा देने और भूल जाने की प्रवृत्ति के चलते ही आज भी ऐसे हादसे होते रहते हैं जिनको थोड़ी सावधानी के साथ पूरी तरह से रोका भी जा सकता है.
                            जिन निर्दोषों की मौत इस घटना में हुई उनके प्रति संवेदना के साथ सरकार को आगे के लिए ऐसी व्यवस्था बनाने के बारे में सोचना चाहिए जिससे कोई भी निजी फर्म इस तरह से केवल पत्राचार के माध्यम से ही ऑक्सीजन सप्लाई या अन्य अतिआवश्यक और महत्वपूर्ण कार्य को रोक न सके. इसके लिए खुद सरकार को भी यह नियम बनाना होगा कि किसी भी निजी फर्म का बकाया भी समय से चुकाया जाये क्योंकि इस मामले में भुगतान न होना ही समस्या का मूल कारण बताया जा रहा है. स्थानीय एजेंसियों के भुगतान में असफल रहने पर उसकी सूचना स्वतः ही राज्य मुख्यालय तक पहुँचने की एक केंद्रीयकृत व्यवस्था भी होनी चाहिए. साथ ही सरकार को और भी संवेदनशील होने की आवश्यकता है क्योंकि जिस तरह से सरकार की तरफ से यह कहा गया कि मौतें ऑक्सीजन की कमी से नहीं बल्कि अन्य कारणों से हुई हैं तो वह सरकार का झूठ खोलने का काम करने वाला ही साबित हुआ क्योंकि इस बारे में गोरखपुर दैनिक जागरण ने पहले ही एक खबर प्रकाशित की थी जिसमें इस खतरे के बारे में आगाह किया गया था. इस मामले में जहाँ मेडिकल कॉलेज प्रशासन, मंडल और जिला प्रशासन की लापरवाही सामने आ रही है वहीं एसएसबी और निजी क्षेत्र के चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के अभूतपूर्व सहयोग की बात भी सामने आ रही है जिनके प्रयासों से मौतों के सिलसिले को रोकने में मदद मिली थी. सीएम आदित्यनाथ को इस मामले को अपने स्तर से देखना चाहिए क्योंकि गड़बड़ी कहाँ से अधिक हुई यह खुद गोरखपुर में उनके अपने समर्थक आसानी से स्पष्ट कर सकते हैं जिससे उन्हें इस तरह की घटनाओं को रोकने में सहायता मिल सकती है.         
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