मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 12 November 2017

छवि बचाने के संकट में मोदी

                                                           २०१४ में अपने मज़बूत प्रचार और सटीक नीति के चलते गुजरात के सीम नरेंद्र मोदी ने जिस बड़े परिदृश्य का उपयोग करके देश की जनता के सामने कुछ ऐसा दिखाने में सफलता पायी थी जिसके चलते उन पर विश्वास करके देश ने उन्हें पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए स्पष्ट जनादेश दिया था. गुजरात में गुजराती अस्मिता और विकास की बातें करके जिस तरह से उन्होंने कई क्षेत्रों में बड़े बदलाव करने में सफलता पायी थी संभवतः वही उनकी राजनैतिक शक्ति भी थी पर पूर्ण बहुमत की भारत सरकार को भी बिना किसी जवाबदेही के गुजरात सरकार की तरह चलाने की मूलभूत गलती प्रारम्भ से ही मोदी और उनकी सरकार द्वारा की जाती रही है और कहा तो यहाँ तक जाता है कि यह केवल दो लोगों की सरकार है और उससे आगे वहां किसी की भी कोई सुनवाई नहीं होती है. अपने से लम्बे राजनैतिक और प्रशासनिक अनुभव रखने वाले नेताओं को मोदी की टीम द्वारा जिस तरह से किनारे किया गया था आज संभवतः उसके चलते भी कुछ मामलों में सरकार के पास ऐसे नेताओं की कमी दिखाई देती है जो सड़क से संसद तक सामने आने वाले मुद्दों पर गंभीरता से विपक्ष और जनता के साथ विश्वसीय संवाद बनाये रखने की हैसियत रखते हों.
                              ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने की अभी तक मोदी और उनकी टीम को कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी थी क्योंकि सत्ता में आने के साढ़े तीन वर्षों से वे, उनके मंत्री और भाजपा की तरफ से केवल कांग्रेस पर हमले ही किये जाते रहे हैं और भ्रष्टाचार के अधिकांश मामलों केंद्र और सम्बंधित राज्यों में भाजपा की सरकार होने के बाद भी कोई विशेष प्रगति दिखाई नहीं देती है जिससे कहीं न कहीं जनता के उस वर्ग में संदेह उत्पन्न होने लगता है जो किसी भी दल से जुड़ा हुआ नहीं है पर २०१४ में उसने मोदी के नाम पर भाजपा को वोट दिया था. यह एक विचारशील वर्ग का वोट है जो किसी भी समय किसी एक दल के साथ नहीं रहता है और समय आने पर अपने विवेक के अनुरूप काम करता है. आज भाजपा की मोदी सरकार और संघ जिस तरह से अपने मूलभूत वैचारिक सिद्धांतों पर जिस तरह से एक दूसरे के सामने खड़े नज़र आते हैं तो भाजपा की मोदी सरकार और विपक्ष में रहते हुए बयान देने वाली भाजपा में बहुत अंतर् दिखाई देता है. राष्ट्रवाद के नाम पर दूसरों को दबाने और स्वयं उस दिशा में कोई ठोस प्रयास न करने के कारण ही आज मोदी अपनी छवि को लेकर सोचने के लिए मजबूर होते दिख रहे हैं ऐसा नहीं है कि आज उनकी छवि बहुत कमज़ोर हो चुकी है पर जब इसी तरह की परिस्थिति में उलझ कर अटल सरकार जा चुकी हो तो संघ, भाजपा और मोदी के लिए यह सोचने का सही समय कहा जा सकता है.
            देश के बहुत सारे मामलों पर जिस तरह से संघ भाजपा और मोदी एक सुर में बोलते रहते थे उन पर सरकार में आने पर मोदी की तरफ से कुछ ख़ास नहीं जा सका है कश्मीरी पंडितों, धारा ३७०, राम मंदिर और समान नागरिक संहिता पर इतनी अधिक बातें की जा चुकी थीं कि आज पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार को उसे बोझ समझ कर ढोना पड़ रहा है साथ ही उसे इन ज्वलंत मुद्दों से बचने का कोई रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा है. कश्मीर में महबूबा सरकार में शामिल भाजपा आज जम्मू और लद्दाख के हितों की बात ही नहीं कर पाती है जबकि आज की परिस्थिति में जम्मू और लद्दाख को कश्मीर घाटी की राजनीति से मुक्त करने की कोशिश करने का एक अवसर भाजपा के पास था. चुनावी जीत के लिए मुद्दों को बनाये रखना एक बात है पर सत्ता में होकर उन पर निर्णय कर पाना बहुत ही मुश्किल काम है. अभी तक कांग्रेस को भ्रष्टाचार और नीतिगत जड़ता के मामले पर लगातार घेरने वाले पीएम की तरफ से आर्थिक मोर्चे पर कोई ऐसा काम नहीं किया गया है जिससे देश को कांग्रेस की नीतियों से हटकर चलने का मार्ग दिखाई देता ? एफडीआई, जीएसटी आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन पर भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए कभी देशहित में मनमोहन सरकार का साथ नहीं दिया और लागू करने के बाद जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण कर सुधार को जिस तरह से मज़ाक बना दिया गया है आज वह सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती है.
               अभी तक २०१४ की हार से मूर्छा में पड़ी कांग्रेस को अपने अतिवादी और जबरदस्ती उठाये जाने वाले क़दमों से अपने गृह राज्य गुजरात में जिस तरह से सामने खड़े होने का अवसर मोदी ने दिया है आज वह उनकी गलतियों का परिणाम ही अधिक लगता है क्योंकि एक तरफ आज वित्त मंत्रालय और सरकार जीएसटी के अनाप शनाप तरीके से निर्धारित किये गए स्लैब्स को सुधारने की कोशिशों में लगे हुए हैं वहीँ हाशिये पर पहुँच चुके कांग्रेस उपाध्यक्ष गुजरात के व्यापारियों के सामने हुंकार भरकर कहते हैं कि वे १८% के एक स्लैब के लिए संघर्ष करते रहेंगें और मौका मिलने पर वे केवल एक स्लैब करने की दिशा में काम भी करेंगें. यदि गौर से देखा जाये तो संघ-भाजपा के हिंदुत्व और विकास की प्रयोगशाला में कहीं न कहीं कुछ ऐसा अवश्य हो गया है जिसने पूरे देश में भाजपा का सामना न कर पाने की स्थिति में पहुंची कांग्रेस को गुजरात में दहाड़ने का मौका दे दिया है. इसके चुनावी परिणाम जो भी हों पर कांग्रेस और राहुल गांधी इस बात को रेखांकित करने में सफल होते दिख रहे हैं कि मोदी सरकार व्यापारियों और आम जनता के हितों पर विचार किये बिना ही हर सुधार को ज़बरदस्ती थोपने की कोशिशों में लगी हुई है.
                           आज भले ही व्यापारियों की समस्याओं के चलते सरकार जीएसटी के स्लैब्स का पुनर्निधारण कर रही हो पर इस मामले पर पहले से हमलावर रहने वाली कांग्रेस को यह कहने का मौका हर बार मिलता जा रहा है कि यह उसके द्वारा विरोध किये जाने का परिणाम है और उसके राज में केवल १८% का एक ही स्लैब होगा. आज मोदी के साथ खड़े रहने वाले भाजपा के नेताओं में भी कमी सी दिखाई देती है क्योंकि उन्होंने अपने संदेह असुरक्षा की भावना के चलते बड़े नेताओं को कुछ ख़ास ज़िम्मेदारी दे ही नहीं रखी है और उसके साथ ही अब जिस तरह से अधिकारियों द्वारा दिए गए आंकड़ों के आधार पर मंत्री बयान देते नज़र आते हैं उससे जनता को कोई जुड़ाव महसूस नहीं होता है. फिलहाल ४२ महीनों में मोदी के नायकत्व पर उनकी नीतियों के चलते उठते हुए सवाल आज उन्हें वो सब करने के लिए मजबूर कर रहे हैं जिनके लिए वे कभी कांग्रेस पर हमले किया करते थे.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 7 November 2017

एक्सप्रेस वे और सुगमता


देश के हर कोने में यातायात को सुगम बनाने के उद्देश्य से बनने वाले किसी भी एक्सप्रेस वे से निश्चित तौर पर दो बड़े शहरों के बीच की दूरी भले ही सिमट जाती हो पर जिस उद्देश्य को लेकर इनका निर्माण शुरू किया गया था हमारे देश में वह कहाँ तक पहुँच पाया है संभवतः इस पर अभी किसी का भी ध्यान नहीं गया है. राज्य सरकारों राजमार्ग प्राधिकरण और बीओटी के अंतर्गत निजी क्षेत्र द्वारा बनाये जाने वाले विभिन्न एक्सप्रेस वे पर यदि कोई समग्र रिपोर्ट तैयार की जाये तो वह कहीं से भी बहुत उत्साहजनक नहीं होगी क्योंकि इनकी वर्तमान अवधारणा और उसके आस-पास बसे हुए शहरों को इनसे कितना लाभ हुआ है इस पर अभी तक कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. अब भी इस बारे में नीतिगत सुधार नहीं किये गए तो आने वाले दिनों में इनको बनाने वाली सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की संस्थाओं के लिए बैंकों से लिए गए लोन के ब्याज के खर्चे निकलना भी मुश्किल हो सकता है और देश में शहरों को जोड़ने के लिए अच्छे, सुरक्षित तथा सस्ते मार्ग उपलब्ध कराने की पूरी कवायद पर भी पानी फिर सकता है. इस बारे में पहले से बनाये गए एक्सप्रेस मार्गों की पूरी स्थितियों का आंकलन करके अब नए सिरे से इन्हें नई नीति के अंतर्गत बनाये जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि दो दशक पहले की नीतियां आज के समय में उतनी प्रभावशाली साबित नहीं हो सकती हैं.
इस बात को समझने के लिए देश में सबसे कम समय में बिना किसी विवाद के उच्च गुणवत्ता से बनने वाले आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे का उदाहरण लिया जा सकता है जो निश्चित तौर पर आने-जाने वालों को पसंद आ रहा है पर इसके साथ जिन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए संभवतः आज भी सरकार का ध्यान वहां तक नहीं पहुंचा है जिससे यह बेहद उपयोगी साबित हो सकने वाला मार्ग आज भी उपेक्षा का शिकार सा लगता है. इस तरह से बनने वाले हर एक्सप्रेस वे के बारे में विस्तृत योजना अवश्य बनायीं जानी चाहिए जिससे इसके दोनों तरफ बसने वाले लगभग १०० किमी दूरी तक के शहरों से यहाँ तक पहुँचने के लिए कम से कम टू लेन मार्ग व्यवस्था होनी चाहिए और यदि कहीं पर यातायात अधिक है तो वहां की आवश्यकता के अनुरूप इसे फोर लेन करने के बारे में कार्य किया जाना चाहिए. आज यदि दिल्ली से चलने वाले तीर्थयात्री या पर्यटक आगरा से नैमिषारण्य (सीतापुर) तक जाना चाहें तो उनके पास अच्छा मार्ग होने के साथ ही छोटा मार्ग चुनने का विकल्प नहीं है जिससे वे मजबूरी में अच्छे और लम्बे मार्ग से चलने को अभिशप्त हैं और उन जगहों पर अनावश्यक यातायात बढ़ रहा है जहाँ पर इसको नहीं होना चाहिए साथ ही पुराने बसे शहरों में जाम की समस्या और भी विकराल होती जा रही है. कन्नौज से नैमिषारण्य की दूरी लगभग ८० किमी से भी कम है पर सीधे गंगा नदी पार कर प्रतापनगर चौराहे आने वाले मार्ग की दशा आज भी अच्छी नहीं है जिससे यह यातायात या तो हरदोई या फिर बांगरमऊ होते हुए नैमिषारण्य तक आ सकता है जिसमें समय ईंधन आदि बर्बाद होते हैं. यदि इस सीधे मार्ग को सीतापुर से अच्छी सड़क से जोड़ दिया जाये तो इस मार्ग का उपयोग करने वाले आसानी से बिना किसी जाम में फंसे अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हैं.
यह तो एक मात्र उदाहरण ही है क्योंकि जब इस तरह से एक्सप्रेस मार्गों तक पहुँच को अच्छा बनाया जायेगा तो इनका उपयोग भी बढ़ाया जा सकता है जिससे इनको बनाने और चलाने में लगने वाली लागत को भी कम किया जा सकेगा. आज मंहगे टोल के चलते भी निजी गाड़ियों से कभी-कभार सफर करने वाले लोग इन मार्गों से सिर्फ इसलिए भी बचने की कोशिशें करते हैं क्योंकि उन्हें टोल के रूप में भी काफी धन खर्च करना पड़ जाता है. यदि प्रयास कर इन मार्गों तक पहुँच को अच्छा बनाया जाये और टोल को भी तर्क संगत किया जा सके तो आने वाले समय में इनको बनाने वाली संस्थाओं के पास अपनी लागत को वापस पाने के बेहतर विकल्प उपलब्ध हो जायेंगें जिस वे अन्य जगहों पर मार्गों को बनाना के लिए अपने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर पाने के लिए स्वतंत्र हो सकेंगें. हम भारतीय जिस तरह से लम्बी दूरी की सड़क यात्रा में आनंद को खोजते हैं तो नीतियों में उन पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है और जहाँ से अन्य शहरों को जाने के लिए कट बनाये गए हैं वहां पर खाने-पीने, गाड़ियों की मरम्मत से जुडी व्यवस्थाओं के बारे में भी काम किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि ४/५ घंटे के सफर में एक दो स्थानों पर रुकने की आवश्यकता भी होती है जिसको किसी भी स्तर पर अनदेखा नहीं किया जा सकता है. आने वाले समय के लिए इन स्थानों के समग्र विकास से लम्बी दूरी की यात्रा करने वालों के लिए यह बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं.
अब समय आ गया है कि यूपी जैसी घनी आबादी वाले राज्यों में बनने वाले एक्सप्रेस मार्गों और पहले से बने हुए मार्गों कि बारे में आंकड़े इकट्ठे किये जाएँ जिससे आने वाले समय में आज होने वाली समस्याओं से निपटने में सहायता मिल सके तथा जिन उद्देश्यों से इनका निर्माण किया जा रहा है उसकी पूर्ति भी हो सके. आज की स्थितियों कि अनुरूप यदि भविष्य की योजनाओं के बारे में विचार नहीं किया गया तो इन एक्सप्रेस मार्गों की दशा भी पहले से उपलब्ध राजमार्गों जैसी ही हो जाने वाली है. बड़े राज्यों में राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर इस दिशा में अभी से सोचने की आवश्यकता है जिससे आबादी और यातायात के दबाव को झेलने के हिसाब से पूरे देश में राजमार्गों और एक्सप्रेस मार्गों का सही उपयोग किया जा सके. आर्थिक रूप से उपयोग में सस्ते और सुरक्षित होने के साथ इन पर भरपूर यातायात भी हो जिससे इनकी लागत को समय से निकाला जा सके और देश में राजमार्गों के विकास के वर्तमान परिदृश्य को और भी सुधारा जा सके अब यही समय की आवश्यकता हो गयी है.मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...